Wednesday, 25 April 2012

MY NEW HINDI STORY "गाण्ड मारे सैंया"

गाण्ड मारे सैंया
 
हमारा घर दो मंज़िला है, नीचे के भाग में सास-ससुर रहते हैं और हमारा शयनकक्ष ऊपर के माले पर है।  हमारे शयनकक्ष की पिछली खिड़की बाहर गली की ओर खुलती है जिसके साथ एक पार्क है। पार्क के साथ ही एक खाली प्लॉट है जहाँ अभी मकान नहीं बना है। लोग वहाँ कूड़ा करकट भी डाल देते हैं और कई बार तो लोग सू सू भी करते रहते हैं।
उस दिन मैं सुबह जब उठी तो तो मेरी नज़र खिड़की के बाहर पार्क के साथ लगती दीवार की ओर चली गई। मैंने देखा एक 18-19 साल का लड़का दीवाल के पास खड़ा सू सू कर रहा है, वो अपने लण्ड को हाथ में पकड़े उसे गोल गोल घुमाते हुए सू सू कर रहा है। मैंने पहले तो ध्यान नहीं दिया पर बाद में मैंने देखा कि उस जगह पर दिल का निशान बना है और उसके अंदर पिंकी नाम लिखा है।
मेरी हँसी निकल गई। शायद वा उस लड़के की कोई प्रेमिका होगी। मुझे उसकी इस हरकत पर बड़ा गुस्सा और मैं उसे डाँटने को हुई पर बाद में मेरी नज़र उसके लण्ड पर पड़ी तो मैं तो उसे देखती ही रह गई। हालाँकि उसका लण्ड अभी पूर्ण उत्तेजित तो नहीं था पर मेरा अन्दाज़ा था कि अगर यह पूरा खड़ा हो तो कम से कम 8-9 इंच का तो ज़रूर होगा और मोटाई भी कम नहीं होगी।
अब तो रोज़ सुबह-सुबह उसका यह क्रम ही बन गया था। सच कहूँ तो मैं भी सुबह सुबह इतने लंबे और मोटे लण्ड के दर्शन करके धन्य हो जाया करती थी। कई बार रब्ब भी कुछ लोगों पर खास मेहरबान होता है और उन्हें इतना लंबा और मोटा हथियार दे देता है !
काश मेरी किस्मत में भी ऐसा ही लण्ड होता तो मैं रोज़ उसे अपने तीनों छेदों में लेकर धन्य हो जाती। पर पिछले 2-3 दिनों से पता नहीं वो लड़का दिखाई नहीं दे रहा था। वैसे तो वो हमारे पड़ोस में ही रहता था पर ज़्यादा जान-पहचान नहीं थी। मैं तो उसके लण्ड के दर्शनों के लिए मरी ही जा रही थी।
उस दिन दोपहर के कोई दो बजे होंगे, सास-ससुर जी तो मुरारी बापू के प्रवचन सुनने चले गये थे और गणेश के दुकान जाने के बाद काम करने वाली बाई भी सफाई आदि करके चली गई थी और मैं घर पर अकेली थी। कई दिनों से मैंने अपनी झाँटें साफ नहीं की थी, पिछली रात को गणेश मेरी चूत चूस रहा था तो उसने उलाहना दिया था कि मैं अपनी झाँटें सॉफ रखा करूँ ! नहाने से पहले मैंने अपनी झाँटें सॉफ करके अपनी लाडो को चकाचक बनाया, उसके मोटे होंठों को देख कर मुझे उस पर तरस आ गया और मैंने तसल्ली से उसमें अंगुली करके उसे ठंडा किया और फिर बाथटब में खूब नहाई।
गर्मी ज़्यादा थी, मैंने अपने गीले बालों को तौलिए से लपेट कर एक पतली सी नाइटी पहन ली। मेरा मूड पेंटी और ब्रा पहनने का नहीं हो रहा था। बार-बार उस छोकरे का मोटा लण्ड ही मेरे दिमाग़ में घूम रहा था। ड्रेसिंग टेबल के सामने शीशे में मैंने झीनी नाइटी के अंदर से ही अपने नितंबों और उरोज़ों को निहारा तो मैं तो उन्हें देख कर खुद ही शरमा गई।
मैं अभी अपनी चूत की गोरी गोरी फांकों पर क्रीम लगा ही रही थी कि अचानक दरवाज़े की घण्टी बजी। मुझे हैरानी हुई कि इस समय कौन आ सकता है?
मैंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि सामने वही लड़का खड़ा था। उसने हाथ में एक झोला सा पकड़ रखा था। मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था। मैं तो मुँह बाए उसे देखती ही रह गई थी, वो भी मुझे हैरानी से देखने लगा।
"वो.... मुझे गणेश भाई ने भेजा है !" 
"क.. क्यों .. ?"
"वो बता रहे थे कि शयनकक्ष का ए सी खराब है उसे ठीक करना है !"
"ओह.. हाँ आओ.. अंदर आ जाओ !"
मैं तो कुछ और ही समझ बैठी थी, हमारे शयनकक्ष का ए सी कुछ दिनों से खराब था, इस साल गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ रही थी, गणेश तो मुझे ठंडा कर नहीं पाता था पर ए सी खराब होने के कारण मेरा तो और भी बुरा हाल था।
मैं उसे अपने शयनकक्ष में ले आई और उसे ए सी दिखा दिया। वो तो अपने काम में लग गया पर मेरे मन में तो बार बार उसके काले और मोटे तगड़े लण्ड का ही ख़याल आ रहा था।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"जस्सी... जसमीत नाम है जी मेरा !"
"नाम से तो तुम पंजाबी लगते हो?"
"हाँ जी..."
"तुम तो वही हो ना जो रोज़ सुबह सुबह उस दीवाल पर सू सू करते हो?"
"वो.. वो.. दर असल....!!" इस अप्रत्याशित सवाल से वो सकपका सा गया।
"तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे पेशाब करते हुए?"
"सॉरी मेडम... मैं आगे से ध्यान रखूँगा!"
"कोई जवान औरत ऐसे देख ले तो?"
"वो जी बात यह है कि हमारे घर में एक ही बाथरूम है तो सभी को सुबह सुबह जल्दी रहती है !" उसने अपनी मुंडी नीची किए हुए ही जवाब दिया।
"हम्म... तुम यह काम कब से कर रहे हो?"
"बस 3-4 दिन से ही.....!"
उसकी बात सुनकर मेरी हँसी निकल गई, मैंने कहा, "पागल मैं सू सू की नहीं, ए सी ठीक करने की बात कर रही हूँ।"
"ओह... दो साल से यही काम कर रहा हूँ।"
"हम्म...? तुम्हें सू सू करते किसी और ने तो नहीं देखा?"
"प... पता नहीं !"
"यह पिंकी कौन है?"
"वो.. वो.. कौन पिंकी?"
"वही जिसके नाम के ऊपर तुम अपना वो पकड़ कर गोल गोल घुमाते हुए सू सू करते रहते हो?"
वो बिना बोले सिर नीचा किए खड़ा रहा।
"कहीं तुम्हारी प्रेमिका-व्रेमिका तो नहीं?"
"न... नहीं तो !"
"शरमाओ नहीं .... चलो सच बताओ ?" मैंने हँसते हुए कहा।
"वो ... वो.. दर असल मेरे साथ पढ़ती थी !"
"फिर?"
"मैंने पढ़ाई छोड़ दी !"
"हम्म !!"
"अब वो मेरे साथ बात नहीं करती !"
"तुम्हारी इस हरकत का उसे पता चल गया तो और भी नाराज़ होगी !"
"उसे कैसे पता चलेगा?"
"क्या तुम्हें उसके नाम लिखी जगह पर सू सू करने में मज़ा आता है?"
"हाँ... ओह.. नही.... तो मैं तो बस... ऐसे ही?"
"हम्म... पर मैंने देखा था कि तुम तो अपने उसको पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से हिलाते भी हो?"
"वो.. वो...?" वो बेचारा तो कुछ बोल ही नहीं पा रहा था।
"अच्छा तुमने उस पिंकी के साथ कुछ किया भी था या नहीं?"
"नहीं कुछ नहीं किया !"
"क्यों?"
"वो मानती ही नहीं थी !"
"हम्म... चुम्मा भी नहीं लिया?"
"वो कहती है कि वो एक शरीफ लड़की है और शादी से पहले यह सब ठीक नहीं मानती !"
"अच्छा... चलो अगर वो मान जाती तो क्या करते?"
"तो पकड़ कर ठोक देता!"
"हाय रब्बा .... बड़े बेशर्म हो तुम तो?"
"प्यार में शर्म का क्या काम है जी?" अब उसका भी हौसला बढ़ गया था।
"क्या कोई और नहीं मिली?"
वो हैरानी से मेरी ओर देखने लगा, अब तक उसे मेरी मनसा और नीयत थोड़ा अंदाज़ा तो हो ही गया था।
"क्या करूँ कोई मिलती ही नहीं !"
"तुम्हारी कोई भाभी या आस पड़ोस में कोई नहीं है क्या?"
"एक भरजाई (भाभी) तो है पर है पर वो भी बड़े भाव खाती है !"
"वो क्या कहती है?"
"वो भी चूमा-चाटी से आगे नहीं बढ़ने देती !"
"क्यों?"
"कहती है तुम्हारा हथियार बहुत बड़ा और मोटा है मेरी फट जाएगी!"
"हम्म...साली नखरे करती है ?"
"हां और वो साली सुनीता भी ऐसे ही नखरे करती रहती है!"
"कौन? वो काम वाली बाई?"
"हाँ हाँ ! ... वही !"
"उसे क्या हुआ?"
"वो भी चूत तो मरवा लेती है पर ... ! गाण्ड नहीं मारने देती... !"
"हाय रब्बा... कीहोजी गल्लां कर्दा ए ?"
"सच कहता हूँ साली अपनी गाण्ड को ऐसे मटका कर चलती है जैसे सारी सड़क उसके पियो (बाप) दी ऐ!"
मेरी चूत तो उसकी बातों से पानी पानी हो चली थी, मैंने अपनी नाइटी के ऊपर से ही अपनी चूत की फांकों को मसलना चालू कर दिया। वो कनखियों से मेरी ओर देख रहा था।
"हम्म...?"
"उसकी मटकती गाण्ड बहुत ही जानमारू है.... !"
"हम्म...?"
"वैसे एक बात बताओ?"
"हम्म....?"
"मैं सच कहता हूँ आप भी बहुत खूबसूरत हैं !"
"कैसे?"
"आपकी फिगर तो कमाल की है !"
"हम्म....और क्या-क्या कमाल का है?"
मैं उसका हौसला बढ़ाना चाहती थी, मेरी चूत में तो गंगा-जमना बहने लगी थी, मैं सोच रही थी कि अब फज़ूल बातों को छोड़ कर सीधे मुद्दे की बात करनी चाहिए।
"वो .. वो आपके चूतड़... मेरा मतलब कमर बहुत पतली है!"
"कमर पतली होने से क्या होता है?"
"वो.. जी आपके चूतड़ बहुत गोल-मटोल और कातिलाना हैं !"
"अच्छा ? और?"
"आपके चूचे भी बहुत खूबसूरत हैं !"
"तुम्हें पसंद हैं?"
"हाँ जी... मैं तो आपको रोज़ देखता रहता हूँ ?"
"ओह.. कैसे.. ?"
"छत पर जब आप कपड़े सुखाने आती हैं तो मैं रोज़ देखता हूँ !"
"तुम बड़े बदमाश हो...?"
"जी... आप इतनी खूबसूरत हैं... तो बार बार देखने का मन करता है!"
"हम्म.... तो पहले क्यों नहीं बताया?"
"मैं डर रहा था !"
"क्यों?"
"कहीं आप बुरा ना मान जाएँ?"
"अगर बुरा ना मानू तो?"
"तो..... तो... ?"
उसका गला सूखने लगा था, उसकी कनपटियों से पसीना आने लगा था, मैंने देखा उसकी पैंट में उभार सा बनने लगा था। मैंने भी अपनी नाइटी के ऊपर से ही अपनी लाडो को फिर से मसलना चालू कर दिया, मेरी चूत में बिच्छू काटने लगे थे, बार-बार उसके लण्ड के ख़याल से ही मेरी लाडो पानी पानी हो गई थी, मेरा मन कर रहा था कि झट से इसकी पैंट की ज़िप खोल कर उसके लण्ड को निकाल कर अपनी चूत में डाल लूँ !
"क्या तुम इन खूबसूरत चूचों को देखना चाहोगे?"
"ओह.. हाँ नेकी और पूछ पूछ?"
"पर बस देखने ही दूँगी... और कुछ नहीं करने दूँगी।"
अब वो इतना भी फुद्दू भी नहीं था कि मेरा खुला इशारा ना समझता !
"कोई गल नई मेरी सोह्नयो !" कहते हुए उसने झट से मुझे अपनी बाहों में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से मेरे होंठों को चूमने लगा।
मैंने अपना एक हाथ नीचे करके पैंट के ऊपर से ही उसके खड़े लण्ड को पकड़ लिया और उसे मसलने लगी। उसने अपने एक हाथ से मेरे स्तन दबाने चालू कर दिए और दूसरा हाथ मेरे नितंबों की खाई में फिराने लगा।
मेरी लाडो से रस निकल कर मेरी जांघों को भिगोने लगा था, मुझे लगा कि चूमा-चाटी के इन फज़ूल कामों को छोड़ कर सीधा ही ठोका-ठुकाई कर लेनी चाहिए। मैंने उसे पास पड़े सोफे पर धकेल दिया और उसकी पैंट की जीप खोल दी, फिर कच्छे के अंदर हाथ डाल कर उसका लण्ड बाहर निकाल लिया।
मेरे अंदाज़े के मुताबिक उसका काले रंग का लण्ड 8 इंच लंबा और 2 इंच मोटा था. मैंने उसके टोपे की चमड़ी को नीचे किया तो उसका गुलाबी सुपारा ऐसे चमकने लगा जैसे कोई मशरूम हो ! मैंने झट से उसका सुपारा अपने मुँह में भर लिया, मैं उकड़ू बैठ गई और ज़ोर ज़ोर से उसके लण्ड को चूसने लगी।वो तो आ.. ओह... ब... भरजाई जी ... एक मिनट... ओह... करता ही रह गया !

 

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